Seedhi Nazar - सीधी नज़र - hindi stories - rahulrahi

सीधी  नज़र

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वैसे तो उसका नाम भोला था लेकिन, सच कहूँ तो सिर्फ नाम ही भोला था। वो था एक नंबर का शैतान। किसी भी टीचर से पूछ लो तो वह कहता कि कक्षा ८ अ में जाना यानि की यमराज की हवेली में घुसने जैसा था। नए शिक्षक ही नहीं बल्कि स्कूल के सबसे पुराने टीचर्स भी भोला के नाम से डरते थे। कभी च्वींग गम कुर्सी पर लगा देना, क्लास में अजीब-अजीब आवाज़ें निकालना, मोबाईल फोन लेकर आना, ये सब तो उसके बाएँ हाथ का खेल था; लेकिन टीचर्स ही नहीं वह तो प्रिंसिपल की नाक में तक दम कर देता था। मुसीबत यह थी कि वह स्कूल पढ़ाई करने नहीं बल्कि मौज करने आता था। अब ऐसे बच्चे का क्या किया जाए जिसे पास होने की चिंता और फेल होने का डर नहीं। उसका व्यक्तित्व इतना मज़बूत था कि उसकी शैतानियों के बावजूद वह स्कूल के विद्यार्थियों का नेता था। नेता भी कोई मामूली नहीं उन सब में एकता भी कूट-कूटकर भरी थी। एक बार तो पटाखे जला दिए क्लास में और बेचारी जान की मारी, दुबली-पतली उनकी क्लास टीचर ऐसा भागी कि फिर कभी स्कूल आगमन न हुआ। 

वो तो चली गई अपनी जान छुड़ा के लेकिन नवम्बर के महीने में अगर कोई टीचर स्कूल छोड़ जाए तो उसकी भर पाई करना तो ऊँठ के मुँह में जीरा डालने जैसा काम होता है। अब डूबते को तिनके का सहारा। एक ऊँठ, मेरा मतलब है कि एक टीचर स्कूलवालों को मिल ही गया, नाम था विक्रम, लेकिन वह पेशेवर नहीं बल्कि एक काम चलाऊ बन्दा था। मैदान छोड़ भाग चुकी टीचर का सारा काम बाकी महारथियों में बाँट दिया गया और इस नौसिखिए को क्लास टीचर बनाकर कुछ और कार्यालयीन कामों में लगा दिया गया। इससे स्कूलवालों का फायदा ही फायदा हुआ और काम चल पड़ा। पैसे तो बच ही गए। और यह नया बन्दा भी सिर्फ कुछ महीनों के कॉन्ट्रेक्ट पर होगा तो अगले साल कोई ना कोई तो मिल ही जाएगा। मैनेजमेंट के तो दोनों हाथों में लड्डू आ गए थे। 

भोलानाथ ने सिर्फ २ ही दिनों में पता लगा लिया कि यह नया टीचर तो भोंदू है, कुछ भी नहीं कर पाएगा हम लोगों का। उसने कुछ तरकीबें निकालनी शुरू की कि कैसे इस एक्स्ट्रा प्लेयर को निकाला जाए। वैसे भी पिछली टीचर को निकालकर उसके इरादे सातवें आसमान पर थे। दो दिन तो सब ठीक था लेकिन अगले दिन विक्रम का स्वागत क्रमबद्ध रखे गए केले के छिलकों से किया गया, जो उसे उसकी कुर्सी पर रखे गए केले के छिलकों से बनाए गए "GM" तक ले गया। जिसका मतलब था, गुड मॉर्निंग।

"वाह", विक्रम ने यह कह कर सबको चौंका दिया। सारे बच्चे सोच में पड़ गए। "गुड मॉर्निंग टू ऑल ऑफ़ यू।", किसी भी बच्चे ने ये सोचा नहीं था कि ऐसा भी हो सकता था। इस अचानक से आई बारिश के कारण सब के मन ठहर गए थे। चुप्पी को तोड़ते हुए विक्रम ने सारे बच्चों से कहा, "यु ऑल केन सिट डाउन" (आप सभी बैठ सकते हैं)। सभी बच्चे आपस में फुसफुसाते हुए बैठ गए। सभी के चेहरे पर एक अजीब सी चमक आ गई थी। सिवाय एक के, जो था भोलानाथ। आज पहली बार किसी ने उसे बिना लड़े शिकस्त दे दी थी। उसके साथी भी बड़े आश्चर्य में थे कि ये अजूबा कौन है? लेकिन अपने शैतान पथ से भटके हुए यारों के सर पर मारकर उन्हें फिर से राह दिखाने वाले भोले ने कहा, "ये बस एक इत्तेफाक था और कुछ नहीं।"

"वैसे कोई बताएगा कि इतना अच्छा आर्टवर्क भला किसने तैयार किया है ?", "सर वो..." राजन जो क्लास मोनिटर था, एक तरह से खबरी भी, उसकी बात को विक्रम सर ने बीच में ही काट दिया, "shsss....", अपने होठों पर ऊँगली के इशारे से उसे चुप रहने को कहा और उसी ऊँगली से नीचे बैठने का इशारा किया। राजन बिचारा सर को घूरते हुए बैठ गया। विक्रम सर ने कहना शुरू किया, "शायद आप लोगों ने ध्यान से सुना नहीं", फिर आवाज़ बढ़ाई, "आप लोगों में से किसने ये बेहतरीन काम किया?" पूरी क्लास में सन्नाटा पसरा था। अपने स्वर को धीमा करते हुए विक्रम सर ने कहा, "आप सभी मेरी बात सुन सकते हैं। समझ सकते हैं। और उसको अपने दिमाग से सोच कर उसका उत्तर दे सकते हैं।" सभी बच्चे ध्यान से सुन रहे थे। धीमे से कहा, "हैं या नहीं... ?", सभी आवाज़ से मंत्र मुग्ध थे। सर ने ज़ोर से कहा, "अरे हैं या नहीं?", आँखें खुल गई, "हाँ...", "तो आज से कोई भी किसी और की कम्प्लेंट नहीं करेगा, किसी की चुगली नहीं करेगा, सिर्फ अपने बारे में बात करेगा, खुद की तारीफ़ और खुद की शिकायत, किसी और की नहीं।"बच्चों के लिए ये सब बहुत ही अजीब था लेकिन था कुछ नया, अनोखा, इसीलिए सब विक्रम सर की हाँ में हाँ मिला रहे थे। "इज़ इट क्लियर?" अबकी बार एक ही बार में, एक ही स्वर में उत्तर मिल गया, "यस सर।"

इस सुबह की शुरुआत कुछ करामाती हो गई थी। किसी भी बच्चे कोई भी खबर अब तक नहीं थी कि यह अनोखा सा इंसान कौन आ गया है हमारे बीच। सिवाय भोलानाथ के। अपना परिचय देने से पूर्व अब भी विक्रम सर जानना चाहते थे कि कौन है वह महापुरुष जिसने इस कार्य को अंजाम दिया था। "तो अब बताओ कि यह केले के छिलकों की सजावट किसने की है, मुझसे डरने की कोई ज़रूरत नहीं। उठो और अपना नाम बताओ।" भोले के बगल में बैठा उसका साथी साथी विशाल उठ खड़ा होने ही वाला था कि भोला ने उसका हाथ कसके पकड़ लिया, "अबे उल्लू, मरवाएगा क्या, देख नहीं रहा कि वो हमें फँसाना चाहता है।", विशाल को अपनी बातों में उलझाकर भोला ने उसे बैठा लिया। लेकिन किसी शांत झील की तरह उस कक्षा बैठे सारे विद्यार्थियों के बीच हुई ज़रा सी हलचल को विक्रम सर ने भाँप लिया कि यह काम किसका है। उन्हें २ मिंट नहीं लगे यह पहचानने में कि इसके पीछे किसका हाथ था। उन्होंने तुरंत अपनी ऊँगली विशाल की तरफ दाग दी। "तुम..", "कौन... मैं?", विशाल अपने आप का बचाव करते हुए कह रहा था। "यस, करेक्ट, तुम ही।" विशाल धीरे से खड़ा हुआ। भोला ने मन ही मन कहा, सत्यानाश  विक्रम सर धीरे - धीरे अपनी जगह पर चहलकदमी करने लगे। कक्षा में ज़रा भी आवाज़ नहीं थी। सभी को ताज्जुब हुआ कि कैसे विक्रम सर ने मुजरिम की टोली पहचान ली। 

"क्या तुम्हें पता है यह GM किसने लिखा है?", विशाल को तो पता था और कहने जा भी रहा था, लेकिन तुरंत ही विक्रम सर ने ज़ोर से कहा, "जाने दो, कोई बात नहीं, फिर कभी बताना।" विशाल ने अपना सिर नीचे किया और भोला को धीमे स्वर में कहा, "बाल-बाल बचे आज।", "सुनों, तुम्हारा नाम क्या है?", विक्रम सर ने विशाल से सवाल किया, "जी?", "जी नाम है तुम्हारा?" विक्रम सर के इस मज़ाकिए लहजे पर सभी शांत बच्चे ठहाका मारने लगे। पूरे वर्ष के सत्र में यह पहली बार हुआ कि भोला के गैंग का मज़ाक उड़ाया गया। क्लास कुछ पलों में शांत हुई, "मेरा नाम विशाल", "और तुम्हारा...?", "मैं भोलानाथ", भोला ने बैठे-बैठे ही उत्तर दे दिया। "नेता बनोगे लगता है, लगता है सीट बड़ी प्यारी है तुमको।" सभी लोग फिर से हँसने लगे, भोला इस मज़ाक को समझ गया, वो झट से खड़ा हुआ। "ठीक है jokes apart, आज से विशाल इस क्लास का क्लीनिंग इंचार्ज है और, भोला उसकी सहायता करेगा, साफ़ - सफाई करने में।" इतना सुनते ही सारे बच्चे विशाल और भोला को घूर कर देखने लगे, क्योंकि यह काम तो असंभव सा था। विशाल तो ठीक था लेकिन भोला और ज़िम्मेदारी, उसपर भी सफ़ाई, यह तो हो ही नहीं सकता था।

विक्रम सर के कहने पर विशाल और उसके सहायक भोलानाथ ने, जो कि असल में शैतानों का मुखिया था,  उन केले के छिलकों की सफाई की। बच्चों की हाजिरी ली गई, नए सर ने अपना परिचय अपनी कक्षा को दिया। कभी गंभीरता तो कभी ठहाकों के बीच विक्रम सर ने पूरी क्लास का मुआयना कर लिया। हर कोई खुश नज़र आ रहा था अपने नए क्लास टीचर के सिवाय २ लोगों के, विशाल और उसका सहायक भोलानाथ।

देखते ही देखते समय बीत गया और स्कूल के बड़े घंटे की आवाज़ से पता चला कि पहला पीरियड खत्म हो चुका है। विक्रम सर जैसे ही अपनी जगह से उठे, सारे बच्चे उनके सम्मान में खड़े हो गए। सभी ने एक ही स्वर में, "thank  you sir" कहकर उनका अभिवादन किया। ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था। विक्रम सर ने भी थोड़ा सा झुककर बच्चों के अभिवादन को स्वीकार किया। जाते वक्त भोला और विशाल की नज़र विक्रम सर पर थी। विक्रम सर ने इशारे से उन दोनों को बुलाया। जैसे ही वो दोनों क्लास के बाहर आए, विक्रम सर ने कहा, "मैं अच्छी तरह से तुम दोनों को जानता हूँ", फिर भोला की तरफ नज़र करते हुए कहा, "तुम इन सबके बॉस हो, लेकिन मैं तुम्हें डाँटने मारने नहीं आया हूँ।" उसके गाल पर हाथ रखते हुए कहा, "तुम भी मेरे बच्चे की तरह ही हो, तुम्हारे अंदर बहुत सी अच्छी बातें हैं, जो औरों को नहीं दिखती, तुम्हें भी नहीं दिखती, पर मुझे दिखती है।" यह सुनकर विशाल का तो मुँह खुला ही रह गया, उसे लगा था कि क्लास के बाहर असली क्लास ली जाएगी। "मैंने जो काम दिया है करोगे ना?" विक्रम सर सीधे भोला की आँखों में झाँककर कह रहे थे, मानों उससे नहीं, उसकी आत्मा से बातें हो रही हो। भोला ने भी सिर हिलाकर हामी भर दी। विक्रम सर अब अगली क्लास की ओर बढ़ चुके थे। विशाल भी क्लास में चला गया। लेकिन भोला अब भी जाते हुए विक्रम सर को देख रहा था, उसकी भी नज़रें सीधी एकटक विक्रम सर को देख रही थी, लबालब प्रेमाश्रुओं से भरी।
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