Solar Journey - सौर जनक यात्रा - hindi article



चारों ओर घना अंधेरा, कोई सुरक्षा की व्यवस्था नहीं, ना ही किसी का साथ और ना ही कोई रौशनी, बस एक लक्ष्य कि इन आदिवासी लड़कियों के लिए कुछ करना है। रोज़ २५ किमी चलकर आना जाना, शहर से दूर गाँवों में, उन्हीं आदिवासी लोगों के साथ रहना, अंधेरे में दीप जलाए रखना, असम्भव के बराबर ही था। लेकिन दीदी ने यह सब कर दिखाया। ना कोई सरकारी मदद, और ना ही कोई पिछला अनुभव। पर ऐसा क्या किया उन्होंने और कौन हैं वो दीदी। बताता हूँ।

वैसे तो मैं जनक दीदी (पदमश्री जनक पालटा मगलिगन ) से वर्ष २००९ में मिला था, लेकिन तब मेरी 'समझ' के ताले खुले नहीं थे कि मैं किन लोगों से मिलने जा रहा हूँ। वर्ष बीते, जीवन के अनुभवों ने कुछ मेरी आँखों की ज्योति बढ़ाई और कुछ दिनों पहले मुझे फिर सौभाग्य प्राप्त हुआ, या कह सकता हूँ कि मुझे मेरे जीवन के सबसे बेहतरीन दिनों को जीने का मौका मिला, जनक दीदी के साथ उनकी नई कर्मभूमि, इंदौर से कुछ किमी दूर सनावादिया गाँव में।



मेरे ज़हन में अब भी सन २००९ वाली 'बर्ली' (Barli Development Institute for Rural Women, Indore) की यादें छलक रही थी, जहाँ जिम्मी जी (जनक दीदी के पति) 'शिफलर डिस्क' के बारे में बता रहे थे। जिसके आइनों पर पड़ती सूरज की किरणें परिवर्तित होकर एक बड़े से गोलाकार लोहे के तवे पर पड़ रही थी और उस पर रोटियाँ पक रही थी। मेरे युवा कोरे मन के लिए यह सब कमाल था। जिम्मीजी ने तुरंत ही ज़मीन पर पड़े एक कागज़ को उठाया और परावर्तित होती किरणों के केंद्र पर रख दिया, और कागज़ राख होकर ज़मीन की ख़ाक छानता मिला। वाह! एक ही पल में सारा संदेह दूर हो गया कि यह सौरयंत्र कैसे काम करने वाला है। बचपन में हम अक्सर छोटे - छोटे आवर्धक काँचों (magnifying lens) की सहायता से चीटियों, छोटे कीटों को जलाया करते थे। पर यहाँ मैंने उस शक्ति का सदुपयोग होते हुए देखा। फर्क सिर्फ इतना था कि आवर्धक काँचों से रौशनी छनकर एकत्रित होती है और यहाँ सूर्य किरणें वक्राकार आइनों से परावर्तित होकर अपना कार्य करती है। करीब ८ साल पहले की याद मेरे दिमाग में इस तरह छपी कि मैं उसे भूल नहीं पाया, और जो चमत्कार मैंने तब देखा था, उसका फल मुझे अपने वर्तमान में चखने को मिला।



बर्ली’ को मैंने देखा था, इसीलिए मेरे ज़हन में कुछ इमारतें, एक कुआँ, वो रसोईघर वगैरह वगैरह चित्र उभर रहे थे। लेकिन इंदौर स्टेशन से कुछ किलोमीटर दूर जब तीन भाड़े की जीप में बैठे हम २० लोगों का जत्था एक मटमैले भूभाग पर जा रुका, तो मुझे ज़रा अजीब लगा कि यह तो बर्ली नहीं है। बिल्कुल भी नहीं। एक मंज़िला एक कॉटेजनुमा घर, जिसकी छत पर लगा था, १ किलो वाट का सौर ऊर्जा संयंत्र और घर के बगल में ऊँची घिरनी पर घूमती १ किलो वाट की पवनचक्की। इतना ही नहीं आँगन में रखे हुए सौर कूकर और घर के प्रांगण में, एक जोशीली मुस्कुराहट के साथ हमारा स्वागत करती “जनक दीदी”।

बर्ली में लगभग २५ साल अपना जीवन आदिवासी तबके की लड़कियों - महिलाओं को समर्पित करने, सशक्त करने के बाद जनक दीदी सनावदिया गाँव आ गई। यहाँ पर वह “jimmy mcgilligan centre for sustainable development” के नाम से लोगों को सौर संयंत्रों व प्रकृति से जुड़े जीवनयापन के बारे में बताती हैं। यह कार्य किसी अकेले के बस का नहीं है, और इसीलिए उनके दो मज़बूत कंधें राजेंद्र व नंदा उनकी इस नई राह में उनका भरपूर साथ देते हैं। राजेंद्र व नंदा के सुपुत्र सुनील व सुपुत्री खुद अवयस्क होते हुए भी पास ही के गाँव के बच्चों की अधूरी शिक्षा को बेहतर बनाने में मदद करते हैं। शहरों से भी नई तकनीक लिए युवा अपनी नई सोच के साथ समय रहते इस सेंटर से मुखातिब होते रहते हैं।



उस शाम जनक दीदी ने स्लाइड शो व अनकही यादों के सहारे अपना सम्पूर्ण जीवन हमारे सामने एक परिवार की तरह रख दिया। कई नाज़ुक लम्हों पर वह भावुक हो गईं लेकिन एक सशक्त इंसान और उसकी ज़िंदादिली यही होती है कि वो हर गम का विष हँसके पीकर उसे अमृत बना देता है। जिम्मी और उनकी मुलाकात, नाटकीय ढंग से विवाह, अपने लक्ष्य की ओर एकाग्रता, अनगिनत चुनौतियाँ, बर्ली सेंटर और उनका बढ़ता जीवन, कभी हँसी मज़ाक, कभी गंभीरता, सब कुछ जनक दीदी की ज़ुबानी हमारी नज़रों के सामने किसी ब्लॉकबस्टर फिल्म की तरह हमारे मन को झकझोर रहा था। और उन चंद लम्हों में उनके २५ साल कैसे गुज़रे कुछ पता ना चला। उनके इस जीवन के समक्ष सरकार का पद्मश्री सम्मान तो क्या, विष्णु का अमृतकलश भी फीका सा पड़ गया।

संध्या के डूबते सूरज को देखते हुए यही विचार मन में आ रहा था कि हमनें आज तक अपने देश, अपनी ज़मीन के लिए क्या किया? अपनी मिट्टी का क़र्ज़ भला हम कैसे चुका पाएँगे। “भारत मेरा देश है, सभी भारतीय मेरे भाई - बहन हैं, मुझे अपने देश से प्यार…” पाठशाला में दोहराई जाने वाली इन पंक्तियों के सही मायने मैं उस शाम समझ पाया कि यह मस्तिष्क में भरकर सिर्फ कंठस्थ करने वाली पंक्तियाँ ही नहीं, इन्हें जीवन में उतारना ज़रूरी है, तभी इस जन्म को मायने मिल पाएँगे। जो तेज मैं जनक दीदी व उनके साथियों के चेहरे पर देख पा रहा था, वह कई अमीरज़ादों की रूह से मैंने गायब पाया है।

उसके ठीक बाद, समीर जी ने हमें बहाई धर्म की सीखों पर आधारित एक स्लाइड शो प्रस्तुतिकरण द्वारा अवगत कराया कि हम सभी के जीवन का लक्ष्य क्या हो, हम मनुष्य इस धरती पर कौन हैं, प्रकृति और हमारा सम्बन्ध इत्यादि। दीर्घकालीन जीवन (sustainable living) का एक पहलू आध्यात्मिकता भी है, यह मैंने उस शाम जाना। सच में देखा जाए तो, हम मनुष्य सिर्फ रोटी, कपड़ा और मकान अर्जित करने इस धरती पर नहीं आए हैं, कुछ और भी है जो हम मनुष्यों को बाकी सजीवों से ऊपर रखता है, और उसी मनुष्यता का अस्तित्व समझना पाना और उसके लिए कार्यरत होना ही हमारा लक्ष्य होना चाहिए, जिसे एक हद तक जनक दीदी प्राप्त कर चुकी हैं। उन्होंने बहाई धर्म को समझा भी और बतौर जिया भी। जनक दीदी द्वारा जिए गए किस्सों के साथ पहला दिन किस तरह बीता इसका हमें पता ही ना चला।



अगले दिन जब हम फिर सनावदिया गाँव पहुँचे तब यह पिछली रात ही यह तय हो चुका था कि अगले दिन का खाना सोलर कूकर पर हमारे इस जत्थे के पुरुष सदस्यों द्वारा बनाया जाएगा। जिन उपकरणों के बारे में हमें एक दिन पूर्व बताया गया था, अब उसका इस्तेमाल कर उसे व्यवहार में भी लाने का मौक़ा हमारे पास था। मुझे यकीन तो था लेकिन अब इस यकीन वाले चूल्हे में खाना कितनी देर में पकना है इसकी मालूमात नहीं थी। मई महीने का तपता सूरज भी आज बादलों के पीछे से आँख मिचोली खेले जा रहा था। जब सुनील जी हमें इस सौर कूकर के बारे में बता रहे थे तब मैंने ही सवाल कर लिया कि भारत में तीन ऋतुएँ हर चार महीने के अंतराल में बँटी पड़ी हैं, अब ८ महीने तो आपको सूरज अपनी गर्मीं दे देगा बाकी के बचे चार महीनों का क्या। उन्होंने बड़ी शीलता के साथ जवाब दिया कि हमारे यहाँ घर में प्रतिदिन आनेवाले समाचार पत्रों और मासिक पत्रिकों द्वारा ब्रिकेट्स (कंडे) बनाए जाते हैं, उन्हीं से ४ महीने निकल जाते हैं।

वैसे तो आज के रसोईए सिर्फ हमारी टीम के मर्द ही थे लेकिन सभी लोग ‘मिशन सौर खाना’ के तैयारी में जी जान से जुट गए। कोई सब्ज़ियाँ काट रहा था, कोई अदरक - लहसुन छील रहा था, तो कोई बर्तन इकट्ठे कर रहा है, तो कोई कुछ, तो कोई कुछ। मैं मात्र यहाँ - वहाँ दौड़कर लोगों को उत्साहित कर रहा था और उनकी तस्वीरें और कुछ वीडियो बनाने में लगा था। एक सौर कूकर पर चावल पकना शुरू हुआ, एक पर दाल। सब्ज़ी अभी भी इंतज़ार में थी। रोटी के लिए आँटा एक युवा सदस्य द्वारा माढ़ा गया। कुछ ही देर में चावल पक चुके थे। उन खिले हुए चावलों को देखकर ज़िन्दगी में पहली बार सूरज की धूप पर नाज़ हुआ। पर इस नाज़ का आगाज़ जल्द ही कम होनेवाला था क्योंकि बहुत से बादल घिर आए थे। फिर भी हमनें दाल व सब्ज़ी के पकने की आशाएँ नहीं छोड़ी थी। उधर रोटी का भी हाल बुरा हो रखा था। ज़िन्दगी में पहली बार उन लड़कों ने रोटियाँ बेली थी। जो पहलवाल की चमड़ी सी मोती, और आकर में साउथ अफ्रीका। कमाल की बात यह थी कि अब सूरज की जगह उन ब्रिकेट्स का इस्तेमाल किया जा रहा था। तो इस एक दिन की ही सौर व्यंजन कला से हमें पता चला कि पूरे वर्ष jimmy mcgilligan centre for sustainable development में खाना किस प्रकार पकाया जाता है।



खाना यहाँ पकाया ही नहीं जाता बल्कि सुखाया भी जाता है। हाँ सुखाने से मेरा अर्थ है कि उसका वाष्पीकरण भी किया जाता है सौर ड्रायर की सहायता से। इससे होता यह है कि जिस भी खाद्य पदार्थ को सौर ड्रायर में रखा जाता है, सूरज की गर्मी के कारण उपजे तापमान से धीरे - धीरे उस खाद्य पदार्थ का जल वाष्प में रूपांतरित होकर बाहर चला जाता है। जिससे होता यह कि उस अन्न की गुणवत्ता तो बनीं रहती है लेकिन  उसका उपयोग काल बढ़ जाता है, और हाँ उसका स्वाद भी बरकरार रहता है। और इस तरह किसी भी अनाज कोई, सब्ज़ी को, फल को सुखाकर कुछ दिनों या महीनों बाद भी उपयोग  में लाया जा सकता है।



खाना भले ही नौसिखियों द्वारा बनाया गया लेकिन बना बड़ा ही स्वादिष्ट। दोपहर के खाने के बाद अंदर घर में सभी लोग विराजे। जनक दीदी के आमंत्रण पर उनसे सभी ने अपनी सोच समझ के हिसाब से सवाल पूछे। वहाँ इंदौर के किसी स्कूल की अध्यापिका भी अपने कुछ संगी के साथ वहाँ तशरीफ़ ले आईं, उनके भी सहवास का लाभ हुआ। शाम की लज़्ज़तदार हरबल टी के बाद हम पास के आदिवासी गाँव में गए और उन बच्चों के साथ मिलकर गीत गाए, झूमे - नाचे, और फिर सभी से हँसी - ख़ुशी विदाई ली।



ना सरकारी मदद से आती बिजली, ना लकड़ियों, गैसों, कोयलों का जलना, ना ही जलवायु के कारण खाद्य पदार्थों के सड़ जाने का डर, यह सब मुमकिन है उस लाख किलो मीटर दूर स्थिर जलते हुए गोले के कारण। क्या नहीं दे रहा है यह सदियों से यह सूरज हमें। और क्या कहीं कोई कमी है इस प्रकृति में जो हम अपना जीवन ना जी पाएँ। देश की सरकार आज भी गाँवों की प्रगति के लिए जूझ राही है, कई - कई योजनाएँ बन रही हैं। कुछ अमल में आ रही हैं, कुछ धूल खा रही हैं। ज़मीन का इंधन ख़त्म हो रहा है, ग्लोबल वॉर्मिंग का ख़तरा सिर पर मँडरा रहा है। लेकिन सिर पर मँडराते हुए ख़तरे के ऊपर ही इस ख़तरे का मुँह तोड़ जवाब मौजूद है। हमारी शिक्षा में कहीं भी इसके उपयोग के बारे में कोई भी उल्लेख नहीं। सौर इंजीनियरिंग एक नई दिशा हो सकती है हम सभी के लिए।

जनक दीदी, ना ही कोई बहुत बड़ी जानकार थी और ना ही वो कोई वैज्ञानिक। सिर्फ़ एक इच्छा शक्ति के कारण पहले बरली और अब jimmy mcgilligan centre for sustainable development की नींव रखकर उन्होंने "जहाँ चाह वहाँ राह" की व्याख्या को "जहाँ सूरज वहाँ राह" में बदल दिया है। मेरे जीवन में भी यह उम्मीद की एक बड़ी रौशनी है, जो सोचता है कि एक गाँव सिर्फ़ प्रकृति की मदद से परिपूर्ण हो सकता है।
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